Rajsthan
कुम्भश्याम का मन्दिर
कुम्भश्याम का मन्दिर सतबीस देवरी से एक छोटी सड़क दक्षिण-पश्चिम की ओर विजयस्तम्भ को ज…
कुम्भश्याम का मन्दिर सतबीस देवरी से एक छोटी सड़क दक्षिण-पश्चिम की ओर विजयस्तम्भ को जाती है। इसी सड़क पर विष्णु के वराह अवतार व कुम्मश्याम का भव्य म…
Read moreफतहप्रकाश महल के दक्षिण-पश्चिम में सड़क पर ही, ग्याहरवी शताब्दी में बना एक भव्य जैिन मन्दिर है जिसमें 27 देवरियाँ होने के कारण यह 'सतबीस देवरी…
Read moreफतहप्रकाश महल कुम्भा महल के प्रमुख प्रवेश द्वार 'बड़ी पोल' से बाहर निकलते ही सामने उदयपुर के महाराणा फतहसिंह द्वारा नव-निर्मित दो मंजिला बड…
Read moreमहाराणा कुम्भा के महल बनवीर की दीवार के दक्षिण में राजपूत पद्धति के बने प्राचीन महल भग्नावस्था में विद्यमान है। ये महल भारतीय स्थापत्य कला के उत्कृष्…
Read moreपुरातत्त्व का कार्यालय व संग्रहालय बनवीर की दीवार के पूर्वी भाग में "तोपखाना" नामक स्थान है जहाँ इस दुर्ग की अनेक छोटी-बड़ी तोपों को एकत्र…
Read moreश्रृंगार चंवरी बनवीर की दीवार के मध्य भाग में राजपूत व जैन स्थापत्य कला के समन्वय का एक उत्कृष्ट नमूना है जो "श्रृंगार चंबर'' के नाम से…
Read moreनौखाल भण्डार इस दीवार के पश्चिमी सिरे पर एक अर्द्धवृत्ताकार अपूर्ण बुर्ज तथा कमरा बना हुआ है जो नौलखा भण्डार कहलाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहां पहले…
Read moreबनवीर की दीवार राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज का दासी पुत्र बनवीर चित्तौड़ के महाराणा विक्रमादित्य को मारकर जब स्वय गद्दी पर बैठा, तो उसने अपनी स्थिति…
Read moreससोदिया पत्ता स्मारक राम-पोल के सामने ही, दक्षिण की ओर जाने वाले मार्ग पर मुड़ने से पहिले "ससोदिया पत्ता स्मारक" है। जग्गावत (चूण्डावत) शा…
Read moreदुर्ग के द्वितीय-द्वार को पार करते ही दाहिनी ओर दो छतरियाँ दिखाई देती हैं। चार खम्भों वाली छोटी छतरी राठौड़ जयमल के सम्बन्धी कल्ला का स्मारक है तथा उ…
Read moreरावत बाघसिंह का स्मारक पाडन- पोल में प्रवेश करने के पूर्व ही उसके बाँयी ओर रावत बाघसिंह का स्मारक (चबूतरा) है। देवलिया प्रतापगढ़ के सामन्त रावत बाघ…
Read moreगम्भीरी पुल दुर्ग को जाने वाले मार्ग पर हमें लगभग 566 फीट (172.5 मीटर) लम्बा पुल पार करना पड़ता है। यह “गम्भीरी पुल" कहलाता है जो बेड़च की सह…
Read moreचित्तौड़ - दुर्ग समुद्रतल से 590 मीटर (1810 फीट) ऊँचे तथा आसपास भूमि से 152 मीटर (500 फीट) ऊंचे उठे हुए एक पठार पर निर्मित है। इसकी लम्बाई लगभग साढ़…
Read moreमहाराणा उदयसिंह के बाद उनके पुत्र प्रतापसिंह (महाराणा प्रताप ) मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। महाराणा प्रताप ने अपने कुल की मर्यादा को कायम रखा तथा जीवन प…
Read moreबनवीर को हराकर महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय भारत में मुगलों की ताकत बढ़ रही थी। बादशाह अकबर ने प्राय: सभी राजपूत शासको को अपने अ…
Read moreपन्ना धाय का त्याग महाराणा विक्रमदित्य ने चित्तौड़ का किला पुनः प्राप्त तो कर लिया किन्तु स्वभाव में कोई अन्तर नहीं आया, जिसके फलस्वरूप उसके चारों ओर…
Read moreमहाराणा रतनसिंह (द्वितीय) की मृत्यु के पश्चात राणा सांगा की हाड़ी रानी कर्मवती अपने दोंनो पुत्रों, विक्रमादित्य और उदयसिंह को लेकर कुम्भलगढ़ से चित्त…
Read moreमहाराणा सांगा का पूरा नाम संग्रामसिंह था । रायमल के बाद राणा सांगा सन् 1509 ई. में चित्तौड़ की गद्दी पर बैठे तथा अपने शौर्य से केवल मेवाड़ के ही नहीं…
Read moreये महाराणा कुम्मा के पुत्र थे किन्तु पिता से नाराज होकर इंडर की तरफ चले गये थे। जब कुम्मा को मार कर उदयकर्ण राजगद्दी पर बैठा तो रायमल ने मेवाड़ के सर…
Read moreमहाराणा कुम्भा अपने पिता महाराणा मोकल के बाद सन् 1433 ई. में राजगद्दी पर बैठे राजगद्दी पर बैठते ही उन्होनें सबसे पहले अपने पिता के हत्यारे चाचा व मेर…
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कुम्भश्याम का मन्दिर सतबीस देवरी से एक छोटी सड़क दक्षिण-पश्चिम की ओर विजयस्तम्भ को ज…
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